रामपुर – हमारे देश की न्याय व्यवस्था पहले से ही लाखों लंबित मामलों के बोझ तले दबी हुई है। ऐसे में जब कुछ लोग निजी दुश्मनी स्वार्थ बदले की भावना या किसी अन्य कारण से फ़र्ज़ी मुकदमे दर्ज करवाते हैं तो वे केवल एक निर्दोष व्यक्ति को ही नहीं बल्कि पूरे न्याय तंत्र को नुकसान पहुंचाते हैं।
एक झूठा मुकदमा किसी इंसान की ज़िन्दगी के कई अनमोल वर्ष छीन सकता है। अदालतों के चक्कर सामाजिक बदनामी आर्थिक बर्बादी और मानसिक पीड़ा का बोझ केवल वही व्यक्ति समझ सकता है जो इसे झेलता है। जब कोई निर्दोष व्यक्ति सालों तक अपने ऊपर लगे आरोपों के खिलाफ लड़ता रहता है तब उसके परिवार बच्चों और भविष्य पर भी गहरा असर पड़ता है।
ऐसे मामलों में अब्दुल्लाह आज़म खान साहब का मामला भी लोगों को सोचने पर मजबूर करता है। यदि वर्षों तक जेल में रहने के बाद अदालत ने उन्हें इस केस में बरी किया तो यह केवल एक व्यक्ति की रिहाई की कहानी नहीं है बल्कि उन खोए हुए वर्षों का दर्द भी है जो कभी वापस नहीं आ सकते। फिलहाल रिहाई तो अभी संभव नहीं है क्योंकि कोई एक केस हो तब न यहां तो पूरे परिवार पर ही 300 से अधिक मुकदमे हैं ।सवाल यह है कि यदि कोई व्यक्ति अंततः निर्दोष पाया जाता है तो उसके जीवन के वे वर्ष कौन लौटाएगा?
उसकी प्रतिष्ठा उसके सपने और उसके परिवार की पीड़ा की भरपाई कैसे होगी फर्ज़ी मुकदमे केवल एक व्यक्ति के खिलाफ अन्याय नहीं होते बल्कि वे उन लाखों लोगों के न्याय में भी देरी का कारण बनते हैं जो वास्तव में न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं। अदालतों का समय और संसाधन झूठे मामलों में खर्च होते हैं जबकि वास्तविक पीड़ित न्याय के लिए इंतेज़ार करते रहते हैं। समाज और कानून दोनों को इस समस्या को गंभीरता से लेना होगा। जो लोग जानबूझकर झूठे आरोप लगाते हैं और फ़र्ज़ी मुकदमे दर्ज करवाते हैं उनके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। ऐसा करने से न केवल निर्दोष लोगों की रक्षा होगी बल्कि न्याय व्यवस्था में लोगों का विश्वास भी मजबूत होगा।
न्याय केवल दोषियों को सज़ा देने का नाम नहीं है बल्कि निर्दोषों को अनावश्यक पीड़ा से बचाने का भी नाम है। एक सभ्य समाज की पहचान इसी से होती है कि वह सच और झूठ में अंतर कर सके तथा किसी निर्दोष की जिंदगी को झूठे आरोपों की भेंट न चढ़ने दे। आज आवश्यकता है कि हम यह समझें कि किसी व्यक्ति पर लगाया गया झूठा आरोप केवल एक कानूनी कार्रवाई नहीं बल्कि उसके पूरे जीवन पर किया गया हमला हो सकता है। इसलिए फर्जी मुकदमों पर कठोर कार्रवाई समय की मांग ही नहीं बल्कि न्याय और मानवता दोनों की पुकार है।













