जौनपुर की वक्फ संख्या 301-ए में वक्फ बोर्ड को हाईकोर्ट का झटका, नियुक्ति आदेश रद्द बिना सुनवाई हटाया गया मुतवल्ली, अदालत बोली—कानून से ऊपर नहीं है वक्फ बोर्ड – हाईकोर्ट
जौनपुर/प्रयागराज उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड को एक और बड़े कानूनी झटके का सामना करना पड़ा है। जौनपुर की वक्फ संख्या 301-ए से जुड़े बहुचर्चित मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वक्फ बोर्ड द्वारा जारी मुतवल्ली नियुक्ति आदेश को निरस्त कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि किसी व्यक्ति को बिना समुचित सुनवाई का अवसर दिए उसके पद से नहीं हटाया जा सकता।
न्यायालय के इस फैसले को वक्फ प्रशासन में पारदर्शिता, प्राकृतिक न्याय और विधिक प्रक्रिया की जीत के रूप में देखा जा रहा है। क्या था पूरा मामला उसका विवरण इस प्रकार है!
उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने 14 फरवरी 2026 को एक आदेश जारी कर वक्फ संख्या 301-ए, जौनपुर के लंबे समय से कार्यरत मुतवल्ली सैय्यद मोहम्मद हसन नसीम को बिना किसी सूचना के उन्हें पद से हटा दिया था। उनकी जगह मौलाना सैय्यद मोहम्मद असगर अली को नया मुतवल्ली नियुक्त कर दिया गया उनके नियुक्ति होते ही । इस कार्रवाई न स्थानीय स्तर पर कई सवाल खड़े कर दिए। आरोप लगा कि न तो पूर्व मुतवल्ली को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया और न ही प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किया गया।
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि सैय्यद मोहम्मद हसन नसीम वर्ष 1979 से वक्फ के मुतवल्ली के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे थे। चार दशक से अधिक समय तक वक्फ की संपत्तियों, धार्मिक गतिविधियों और व्यवस्थाओं का संचालन करने वाले व्यक्ति को अचानक हटाए जाने पर क्षेत्र में व्यापक चर्चा शुरू हो गई थी।
ट्रिब्यूनल पहुंचा मामला
वक्फ बोर्ड के आदेश को चुनौती देते हुए सैय्यद मोहम्मद हसन नसीम ने उत्तर प्रदेश वक्फ ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटाया और वाद संख्या 6/2026 दाखिल किया।मामले की सुनवाई के बाद ट्रिब्यूनल ने 16 अप्रैल 2026 को वक्फ बोर्ड के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी। ट्रिब्यूनल ने प्रथम दृष्टया माना कि मामले में गंभीर कानूनी प्रश्न मौजूद हैं और बिना सुनवाई की गई कार्रवाई न्यायसंगत प्रतीत नहीं होती।
हाईकोर्ट में पलटा पूरा मामला
ट्रिब्यूनल के आदेश से असंतुष्ट होकर बोर्ड द्वारा नियुक्त मुतवल्ली मौलाना सैय्यद मोहम्मद असगर अली ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में वक्फ अपील संख्या 6/2026 दाखिल की। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पूरे रिकॉर्ड का अवलोकन किया और पाया कि वक्फ बोर्ड की कार्रवाई विधिक प्रक्रिया के अनुरूप नहीं थी।
अदालत ने माना कि—
“किसी भी व्यक्ति को उसके अधिकारों या पद से वंचित करने से पहले उसे सुनवाई का अवसर देना कानून का मूलभूत सिद्धांत है।” इसी आधार पर न्यायालय ने वक्फ बोर्ड के आदेश को निरस्त कर दिया।
हाईकोर्ट के सख्त निर्देश
हाईकोर्ट ने वक्फ बोर्ड को आदेश दिया कि—
1- सभी संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया जाए।
2- प्रत्येक पक्ष को पूरा सुनवाई का अवसर दिया जाए।
3-उपलब्ध अभिलेखों एवं तथ्यों पर विचार किया जाए।
4-उसके बाद दो माह के भीतर नया एवं विधिसम्मत आदेश पारित किया जाए।
न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया कि प्रशासनिक शक्तियों का प्रयोग मनमाने ढंग से नहीं किया जा सकता।
ट्रिब्यूनल की कार्यवाही भी समाप्त
मामले में एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब हाईकोर्ट ने वक्फ ट्रिब्यूनल में लंबित वाद संख्या 6/2026 की कार्यवाही को भी समाप्त (Quash) कर दिया और पूरे मामले को पुनः निर्णय के लिए वक्फ बोर्ड के समक्ष भेज दिया। इसके अतिरिक्त न्यायालय ने आदेश के अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिए रजिस्ट्रार कम्प्लायंस को निर्देशित किया कि वह मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम), लखनऊ के माध्यम से आदेश की प्रति वक्फ बोर्ड को उपलब्ध कराएं।
किसने रखा पक्ष?
अपीलकर्ता मौलाना सैय्यद मोहम्मद असगर अली की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सैय्यद फरमान नकवी ने पैरवी की।
जबकि पूर्व मुतवल्ली सैय्यद मोहम्मद हसन नसीम की ओर से अधिवक्ता सैय्यद मशहूद अब्बास ने प्रभावशाली बहस करते हुए यह तर्क रखा कि बिना सुनवाई की गई कार्रवाई कानून और न्याय दोनों के विरुद्ध है।
वक्फ बोर्ड की कार्यशैली पर फिर सवाल
इस फैसले के बाद वक्फ बोर्ड की निर्णय प्रक्रिया को लेकर नए सवाल खड़े हो गए हैं।
क्या दशकों से सेवा दे रहे किसी मुतवल्ली को बिना निष्पक्ष सुनवाई हटाया जा सकता है?
क्या प्रशासनिक आदेश प्राकृतिक न्याय से ऊपर हो सकते हैं?
क्या वक्फ संपत्तियों के मामलों में विधिक प्रक्रिया का पूर्ण पालन किया जा रहा है?
इन सवालों पर अब कानूनी और सामाजिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है।
फैसले का व्यापक महत्व
विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला केवल जौनपुर की वक्फ संख्या 301-ए तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे प्रदेश में वक्फ प्रशासन के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है कि – न्याय केवल किया ही नहीं जाना चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए।”
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह निर्णय स्पष्ट करता है कि किसी भी संस्था, बोर्ड या पदाधिकारी को कानून और प्राकृतिक न्याय की सीमाओं के भीतर रहकर ही निर्णय लेना होगा। अब सबकी निगाहें उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड पर हैं, जिसे अदालत के आदेशानुसार दो माह के भीतर नया निर्णय लेना है।
सवाल अब भी कायम है—
क्या 41 वर्षों से सेवा दे रहे मुतवल्ली को हटाने की कार्रवाई न्यायपूर्ण थी, या फिर अदालत का हस्तक्षेप ही न्याय की राह बना?













